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शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं |
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ||
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं |
वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

अर्थात् - : जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै- |
र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा: ||
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- |
यस्तानं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम: ||

अर्थात् - : ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्‍गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्‍गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण (कोई भी) जिनके अन्त को नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देव के लिए मेरा नमस्कार है।

Originally Written/Posted By : Amit Sharma
Posted on: 2010-02-17
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